मैं हैरान थी ,क्योंकि अब तक समाज की हकीकत से अनजान थी ।
आज पहली बार एहसास हुआ, कि मैं हिंदू और मेरी वह सहेली मुसलमान थी।
जिसके डिब्बे से कई बार खाना तो मैंने भी खाया था,जिसके साथ स्कूल का हर पल हर लम्हा बताया था ।
जिसने दिवाली पर मुझे ढेरों शुभकामनाएं भी दी थी, छुप के कई बार जिसके घर से ईदी तो मैंने भी ली थी।
आज एहसास हुआ कि वह मेरे धर्म की नहीं थी।
स्कूल में तो सब धरम समान है यही लाइन पढी थी ,
बड़ों ने भी हिंदू मुस्लिम भाई भाई यही बात कही थी।
फिर मजहब के नाम पर सबको अंधा किसने बना दिया?
हाथ जोड़ने के तरीके ने कर भाई को भाई से जुदा दिया।
वैसे तो कुछ दिन बाद हम फिर उसी सीट पर बैठेंगे पहले की तरह,
पर सोचती हूं मैं क्या सब हो पाएगा पहले की तरह ?
और पहले की तरह बेपरवाही से उसे अपने घर की हर बात बताने से पहले खुद को रोको।
अब शायद मैं उसकी अम्मी को चाची कहने से पहले सोचो,
क्योंकि अल्लाह और राम के नारों से अब डर मुझको भी लगता है,
लोगों को मरता देख दिल मेरा भी दुखता है।
और मुझे बस भारत मां का रोता हुआ वह चेहरा दिखता है,
क्योंकि यहां तो बाजार में मजहब के नाम पर इंसा और उनका इमान सरेआम बिकता है।
